नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने Harish Rana Euthanasia Case में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है और गाज़ियाबाद के 31‑32 वर्षीय हरिश राणा को Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह फैसला भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
हरिश राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा जैसी अवस्था में थे और उन पर जीवन‑सपोर्ट मशीनों के द्वारा जीवन बनाए रखा जा रहा था। उनके माता‑पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि अब किसी भी सुधार के संकेत न होने के कारण इलाज को रोक दिया जाए और उन्हें प्राकृतिक तरीके से मरने दिया जाए।
अदालत ने क्या निर्णय दिया?
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के ठीक होने की संभावना न्यूनतम या अस्तित्वहीन हो, तो Passive Euthanasia को मानवीय तरीके से अपनाना दुनिया के विकसित देशों की तरह भारत में भी संभव है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का मतलब “मृत्यु चाहना” नहीं है, बल्कि यह निर्णय हरिश राणा के सर्वोत्तम हित और गरिमा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
Passive Euthanasia क्या है?
Passive Euthanasia में चिकित्सीय हस्तक्षेप को रोक दिया जाता है — जैसे की लाइफ‑सपोर्ट मशीनों से जीवन निर्भरता हटाना — जिससे शरीर प्राकृतिक तरीके से अपनी क्रियाएँ बंद करता है। यह Active Euthanasia से अलग है, जहां किसी औषधि या प्रक्रिया के माध्यम से मौत लाई जाती है, जो भारत में अभी भी गैरकानूनी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Passive Euthanasia तभी दी जानी चाहिए जब:
✔ किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की टीम यह पुष्टि करे कि मरीज के ठीक होने की संभावना नहीं है
✔ जीवन‑सपोर्ट केवल जैविक अस्तित्व बनाए रखने के लिए है
✔ परिवार और डॉक्टरों के बीच उपयुक्त सहमति हो
मामला कैसे शुरू हुआ?
हरिश राणा को 2013 में गंभीर दिमागी चोट लगने के बाद कोमा में रखा गया था और तब से वे मशीनों पर जीवित हैं। उनके परिवार ने कई वर्षों तक इलाज करते रहने के बावजूद सुधार न होने पर अदालत से इस उम्मीद में यह अपील की कि अब उन्हें मानवीय तरीके से मरने दिया जाए।
यह फैसला क्यों अहम है?
यह फैसला 2018 के Common Cause बनाम Union of India मामले में दिये गए “Right to Die with Dignity” (मरते समय गरिमा का अधिकार) सिद्धांत पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी Passive Euthanasia को मानने के संदर्भ में दिशानिर्देश दिए थे, लेकिन हरिश राणा का मामला उन सिद्धांतों का एक बहुत अहम परीक्षण है।
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